श्रोत्रं श्रुतेनैव
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श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन दनेन पाणिर्न तु कङ्कणेन ॥ |
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श्रुतेंच कीं श्रोत्र न कुण्डलानें दानेंच की पाणि न कंकणानें ॥ |
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श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन दनेन पाणिर्न तु कङ्कणेन ॥ |
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श्रुतेंच कीं श्रोत्र न कुण्डलानें दानेंच की पाणि न कंकणानें ॥ |